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कैसे मुक्ति पाएँ मनुष्य के मानसिक तनाव से जन्मे इन तथाकथित फ़र्ज़ी-ढोंगी मौलवी-बाबाओं से ?

Posted On: 5 Sep, 2017 Social Issues में

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नित्यानन्द, रामपाल, आसाराम, राधे माँ, भीमानन्द, जयेन्द्र सरस्वती, निर्मल बाबा, राम-रहीम उर्फ़ गुरमीत सिंह…….काफ़ी लम्बी है ये फ़ेहरिस्त, और लम्बी होती ही रहेगी… तब तक, जब तक कि अँधविश्वास का काला अँधापन आत्मविश्वास के सुनहरे उजाले पर भारी है..

वक़्त के साथ बदलते आधुनिक ज़माने ने मनुष्य को तमाम आधुनिक-विलासितापूर्ण-चकाचौंध भरी सौग़ातें दीं तो साथ ही एक बड़ी और बेहद गम्भीर बीमारी भी दी जिसका नाम है “तनाव”…
इस बीमारी का इलाज कुछ लोग डॉक्टर्स के पास, कुछ नशे में तो ज़्यादातर तथाकथित फ़र्ज़ी-ढोंगी मौलवी-बाबाओं के पास ढूँढ़ते हैं, और आश्चर्य की बात तो ये है कि इनमें से ज़्यादातर लोग सुशिक्षित होते हैं..

विगत १५-२० वर्षों से मनुष्य के भीतर “तनाव” की शुरुआत किशोरावस्था में ही तब शुरू हो जाती है जब उस पर “कैरियर” शब्द का बेहद ज़रूरी “बोझ” समय से काफ़ी पहले ही डाल दिया जाता है. “बोझ” इसीलिये क्योंकि कोई भी ज़रूरी बात यदि समय से काफ़ी पहले की जाए तो वो ज़रूरत से ज़्यादा “बोझ” बन जाती है…बचपन या किशोरावस्था में ही ये भारी-भरकम बोझ लादने वाले कोई और नहीं, बल्कि सबसे क़रीबी और अपने ही होते हैं. लेकिन इसमें क़सूरवार तो पूरी तरह उन्हें भी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि प्रतिस्पर्द्धा के इस बेहद मुश्क़िल दौर में, अपनी सन्तान के भविष्य की गहन चिन्ता इसका मूल कारण होती है. कैरियर की ये आपाधापी किशोरावस्था से शुरू होकर अधेड़ावस्था तो कभी-कभी रिटायरमेण्ट तक भी जारी ही रहती है…

एक बार कैरियर की शुरुआत के बाद कड़ी प्रतिस्पर्द्धा के इस दौर में उसे बनाए रखने, तरक़्क़ी, काम, उच्चाधिकारियों से तालमेल और सम्बन्ध, रोज़मर्रा के ऐसे ना जाने कितने तनावों के बीच मनुष्य की ज़िन्दगी बुरी तरह से उलझकर रह जाती है…

इसी बीच जीवन के दूसरे बेहद अहम दौर याने दाम्पत्य या वैवाहिक जीवन की भी शुरुआत हो जाती है….. कैरियर, पारिवारिक जवाबदारियों और ज़िम्मेदारियों के बीच, आपसी रिश्तों में सामंजस्य बैठाने और सम्बन्धों को निभाने की जद्दोजेहद से उपजे तनावों के चलते मनुष्य जैसे अपना जीवन जीता नहीं बल्कि काटता है….

रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में कैरियर, पारिवारिक और सामाजिक तनावों को झेलते मनुष्य मानसिक रूप से जैसे टूटने लगता है, कहीं कमज़ोर पड़ने लगता है, इस मानसिक तनाव को झेलने-सहन करने-आत्म विश्वास को पाने-आत्म सन्तुलन को बनाए रखने और अपने आप को को मानसिक रूप से मज़बूत करने के लिये नये रास्तों की तलाश करने लगता है और इसी तलाश के चलते तथाकथित फ़र्ज़ी-ढोंगी मौलवी-बाबाओं के आडम्बरयुक्त मोहजाल-मायाजाल के चंगुल में जा फँसता है…

इन तथाकथित फ़र्ज़ी-ढोंगी मौलवी-बाबाओं के पास किसी प्रकार की दैवीय-मायावी शक्ति तो नहीं लेकिन पीड़ित-तनावग्रस्त मनुष्य की कमज़ोर मानसिक स्थिति को पढ़ने-भाँपने-समझने और उस पर प्रहार करने का अचूक अस्त्र अवश्य होता है…. तभी तो आज ऐसे तथाकथित फ़र्ज़ी-ढोंगी मौलवी-बाबाओं के अन्धभक्तों की सँख्या लाखों-करोड़ों तक पहुँच गई है…

इन तथाकथित फ़र्ज़ी-ढोंगी मौलवी-बाबाओं से मनुष्य को मुक्ति कोई और नहीं बल्कि केवल और केवल उसकी अपनी मानसिक शक्ति ही दिला सकती है. मनुष्य को ये समझना बेहद ज़रूरी है कि सबसे बड़ी शक्ति स्वयं उसकी अपनी मानसिक शक्ति ही होती है, जिसे विपरीत या तनावग्रस्त परिस्थियों में अपनी इच्छाशक्ति से जागृत कर मनुष्य किसी भी प्रकार की विपरीत परिस्थियों-मानसिक तनाव इत्यादि से न केवल स्वयं ही मुक्ति पा सकता है बल्कि अपने अन्दर मानसिक ऊर्जा-आत्मविश्वास-आत्मबल का संचार भी कर सकता है… मनुष्य की मानसिक या आन्तरिक शक्ति उसे सही-ग़लत, अच्छे-बुरे की न केवल पहचान कराती है बल्कि उससे दूर रहने-निपटने के लिये प्रेरित भी करती है…

अब सवाल ये है कि मनुष्य अपनी आन्तरिक-मानसिक शक्ति को जागृत अथवा सक्रीय कैसे करे ? उपाय बेहद सरल है… जब कभी मनुष्य चिन्ता-अवसाद-तनावग्रस्त हो, उसके मन में नकारात्मक विचार अपना घर बनाने लगें, उसे चारों तरफ़ केवल विपरीत परिस्थितियाँ ही दिखाई देने लगें और इन सबसे उबरने-निपटने का कोई उपाय अथवा मार्ग दिखाई ना पड़े तो वो तत्काल किसी बिल्कुल एकान्त और बेहद शान्त स्थान पर चला जाए..अपने मन को स्थिर और केन्द्रित करने का पुरज़ोर प्रयास करे…कुछ देर के लिये आँखें बन्द कर आत्मचिन्तन करे कि आख़िर उससे कहीं कोई चूक तो नहीं हो रही, आख़िर इन विपरीत या तनावग्रस्त परिस्थितियों के निर्मित होने के पीछे कारण क्या हैं ? इन विपरीत या तनावग्रस्त परिस्थियों मुक्ति पाने के क्या-क्या उपाय हो सकते हैं ? इन विपरीत अथवा तनावग्रस्त परिस्थितियों से से मुक्ति पाने में कौन मददग़ार हो सकता है ? इत्यादि…

हो सकता है ऐसा करने के बावजूद कुछ समय के लिये मनुष्य को अपनी चिन्ता-तनावग्रस्त-विपरीत परिस्थितियों से निजात ना मिले लेकिन इनसे लड़ने के लिये आन्तरिक मानसिक शक्ति एवं आत्मविश्वास अवश्य मिलेगा..

विपरीत या तनावग्रस्त परिस्थितियों के दौरान मनुष्य को बेहद महत्वपूर्ण बात ज़रूर याद रखनी चाहिये कि समय को गुज़रने या बदलने से कोई नहीं रोक सकता और बुरे से बुरे समय का अन्त सुनिश्चित है…ज़रूरत है तो बस धैर्य-संयम की, आत्मचिन्तन की, आत्मबल की…..

मनुष्य यदि शान्त-एकान्त स्थान पर स्वयं ही आत्म चिन्तन कर ले तो उसे जीवन में कभी भी तथाकथित फ़र्ज़ी-ढोंगी मौलवी-बाबाओं-मार्गदर्शकों-आध्यात्मिक गुरुओं की ज़रूरत नहीं पड़ेगी…

मनुष्य को ये नहीं भूलना चाहिये कि जीवन अमूल्य होता है और जीवन का सौभाग्य केवल सौभाग्यशाली लोगों को ही मिलता है और वो भी केवल एक बार.. इसीलिये ज़रूरी है कि इस अमूल्यवान जीवन के मूल्यवान समय के प्रत्येक मूल्यवान क्षण को तथाकथित फ़र्ज़ी-ढोंगी मौलवी-बाबाओं के पीछे अथवा नशे में गँवाए बिना, इस प्रत्येक क्षण को सार्थक बनाएँ…

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